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आंध्र के युवक ने ऐष्वर्य को बताया अपनी आईवीएफ मां 

  -दावा किया कि आईवीएपफ तकनीक से ऐष्वर्य ने उसे दिया 1988 में जन्म मुंबई। आंध्र प्रदेश के 29...

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मन न रंगाये, रंगाये जोगी कपड़ा .............?

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कल रेलयात्रा पर था। बाहर फर्राटा भरते इंजन का रोंगटे खड़े कर देने वाला षोर तो भीतर कुछ लोगों के...

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    Wednesday, 03 January 2018 02:00

राज रंजना

पुलिस प्लेटफार्म

विविध रंग

आंध्र के युवक ने ऐष्वर्य को बताया अपनी आईवीएफ मां 

  -दावा किया कि आईवीएपफ तकनीक से ऐष्वर्य ने उसे दिया 1988 में जन्म मुंबई। आंध्र प्रदेश के 29 वर्शीय एक युवक संगीत कुमार ने यह दावा करके सनसनी फैला दी है कि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की पुत्रवधू ऐश्वर्य रॉय बच्चन उनकी मां हैं। उसके इस दावे से बच्चन परिवार सकते में है। हालांकि उसने इस बावत कोई प्रतिक्रिया फिलहाल नहीं दी है। वैसे अतीत के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि ऐष्वर्य ने 2007 में अभिषेक बच्चन के साथ सात फेरे लिये थे। आज की तिथि में उन्हें 6 साल की एक बेटी आराध्या है जिसे बिग बी बेहद प्यार करते हैं।  उधर संगीत कुमार का दावा है कि ऐष्वर्य ने सेलिब्रिटी बनने से पहले आईवीएफ टेक्नीक से 1988 में उसे लंदन में जन्म दिया था। उसने बताया कि 3 से 27 साल तक वह चोड़ावरम में रहा। शुरुआती दो साल तक नानी वृंदा कृष्णराज रॉय के परिवार के साथ रहा। पिछले साल उसके नाना ने यह दुनिया छोड़ दी। उसके उसके मामा का नाम आदित्य रॉय है। संगीत का दावा तो यहां तक है कि उसकी मां ने साल 2007 में अभिषेक बच्चन से शादी की थी। अब वह उनसे अलग हो चुकी हैं और आजकल अकेले ही रह रही हैं। उसका कहना है कि अब वह चाहता है कि वह मंगलुरु आकर उसके साथ रहने लगें।  उसने यह भी कहा कि वह 27 साल से अपने परिवार  से दूर है और उन्हें बहुत मिस करता है। उसने कहाएष्ष्मैं चाहता हूं कि मुझे मां का नंबर जल्द से जल्द मिल जाए।ष्ष् संगीत यह भी कहता है कि सही जानकारी नहीं मिल पाने की वजह से वह ऐश्वर्या तक नहीं पहुंच पा रहा था अन्यथा कब का उनके पास पहुंच जाता। अगर संगीत की बात पर यकीन करना या न करना दरकिनार लेकिन हकीकत यह है कि 1988 में ऐश्वर्या की उम्र महज 14 साल ही थी। अब यह एक बेहद तकनीकी सवाल होगा कि क्या ऐष्वर्या महज 14 साल की उम्र में मां बनने के लिए परिपक्व थीं!   

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------------एक नजर--------------

-कुख्यात बदमाषांे के लिए सबसे सुुरक्षित मांद बन गए हैं कारागार

-आजमगढ़ व मऊ भी गैंगों के गढ़ लेकिन माफिया डॉन बनारस के

-पूर्वी उत्तर प्रदेष में कुल 64 रजिस्टर्ड माफिया गिरोह पूर्ण सक्रिय

-5 गिरोह अंतर्राज्य,एक अंतरजोन, 26 अंतर्जिला, 26 जिला स्तर के 

-मुख्यतः बृजेष सिंह, मुख्तार अंसारी व बजरंगी ही अण्डरवर्ल्ड डॉन 

-तीस माफिया सरगना जेल में जबकि पंद्रह जमानत के बाद बाहर

-फरार बीकेडी,मनीष,काका,अजीम व कौषल पुलिस के लिए चुनौती

-पुराने घरानों ने रीयल इस्टेट को बनाया ब्रेड ऐंड बटर का जरिया 

-नयों का गुजर-बषर अब भी गुण्डा टैक्स और फिरौती पर निर्भर

-आभूषण व रत्न व्यवसायी अब इन गिरोहों के लिए सॉफ्ट टारगेट ------------------------------------------

वाराणसी। पूर्वाचल के आपराधिक इतिहास के पन्नांें पर वर्ष 2013 को सूबे के इस हिस्से में संगठित अपराध की वापसी के वर्ष के रुप में भी जाना जायेगा। आज की तारीख में पूर्वाचल के लोग महसूस करने लगे हैं कि अब तो जेल ही माफिया सरगनाआंे के लिए सबसे सुरक्षित मांद बन गयी हैं जहां से वे बेखौफ होकर अपने गिरोहों का संचालन कर रहे हैं। एक ताजा खास खबर यह भी है कि पुराने माफिया डॉनांे ने जहां एक ओर अपनी रोजी-रोटी जरिया रीयल इस्टेट यानि सस्ती दरों पर जमीनों की खरीद और महंगी दरों पर बिक्री को बना लिया है वही दूसरी ओर नये सरगनाओं ने गुण्डा टैक्स और फिरौती को ही मुख्य व्यवसाय बना रखा है।

याद किया जाय तो सूबे का यह क्षेत्र्ा पिछले लगभग दो दशक से दो कुख्यात माफिया सरगनाओं बजेश सिंह, मुख्तार अंसारी और प्रेमप्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी गिरोह के लिए मैदान-ए-जंग बना रहा है। कभी ऐसा भी हुआ कि मुख्तार अंसारी और मुन्ना बजरंगी ने मिलकर बजेश गिरोह पर वार किया और भारी पडे़। वर्ष 2004 में गाजीपुर में ब्रजेश सिंह के एक अभिन्न सहयोगी और भाजपा के विधायक कष्णानन्द राय का कत्ल इसकी एक बानगी था। इस कांड के लगभग एक साल बाद ही पूर्वाचल के माफिया सरगनाओं का जेल जाने का सिलसिला तेजी से शुरु हुआ। 2005 में सबसे पहले कष्णानन्द हत्याकांड में मुख्तार को जेल भेजा गया।इसके बाद 2008 में बृजेश सिंह और 2009 में मुन्ना बजरंगी भी गिरफ्तार कर लिया गया। इन सभी के जेल जाने के बाद इनके बीच की खूनी जंग शांत पड़ गयी लेकिन मई 2013 में बृजेश के अभिन्न साथी माने अजय खलनायक को गोली मारे जाने तथा जुलाई में बृजेश के चचेरे भाई सतीश सिंह की उसके पैत्र्ािक गांव धौरहरा (वाराणसी) में हत्या के बाद राख में दबी चिंगारी फिर भड़क उठी। इसी समय यह भी प्रकाश में आया कि इन्द्रदेव सिंह उर्फ बीकेडी नामक एक नया माफिया गिरोह सामने आ गया है और खलनायक को गोली मारने तथा सतीश सिंह की हत्या को उसी के गिरोह ने अंजाम दिया है। यह भी पता चला है कि बीकेडी को मुन्ना बजरंगी की भी छत्र्ाछाया हासिल है जो वर्तमान में सुल्तानपुर जिला कारागार में बंद है।

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धेले की जमीन पर करोड़ों का दांव

 

पूर्वांचल के माफिया गिरोहों के बीच ताजा गैंगवार शुरू होने से पूर्व यहां के रीयल इस्टेट व्यवसाय पर अंडरवर्ल्ड डॉनों की धमाकेदार उपस्थिति सामने आ चुकी थी। कहा यह जा रहा है कि इस धंधे पर इनके कुण्डली मारकर बैठने का सबसे बड़ा कारण धेले की जमीनों को करोड़ों में फटकार लेना ही रहा है। विवादित जमीनों को औने-पौने में खरीद लेने और उसे अपने बाहुबल के सहारे करोड़ों में बेच लेने का धंधा शुरू हुआ तो इसपर एक के बाद एक गिरोह की नजरें गड़ती चली गयीं। इस व्यवसाय पर अंडरवर्ल्ड के सरदारों का कब्जा शुरू हुआ तो मिनी भू-माफिया भी उनमें से किसी ने किसी से छांव मांगकर उनसे जुड़ गये। यह बात सबसे पहले तब धरातल पर उजागर हुई जब 26 अप्रैल को मुन्ना बजरंगी और उसके कुछ सहयोगी बिल्डरों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए। सच तो यह है कि इस धंधे पर माफिया गिरोहों की पकड़ नयी नहीं अपितु दशकों पुरानी है। इससे भी बड़ा सच यह है कि इन माफियाओं को धन्नासेठ बनाने का काम शहर की बेशकीमती विवादित जमीनें ही करती रही हैं। पहले तो ये माफिया केवल विवाद सुलझाने के लिए पार्टियों से पैसे लेकर अलग हो जाते थे लेकिन बाद के दिनों में इन्होंने खुद ही जमीनें खरीदकर उन्हें बेचना या उनपर शॉपिंग काम्पलेक्स आदि बनवाना शुरू किया जो आज भी जारी है। 

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जेल नहीं वरदान, हर माह होता है वेतनदान 

प्रदेश में अपराधों को पंख लगाने का एक बड़ा श्रेय यहां के कारागारों को भी जाता है। दरअसल अपराधियों के लिए ये जेल काफी होमली के साथ ही एक बेहतर प्रोटेक्शन होम साबित हो रहे हैं जहां से वे अपनी समस्त आपराधिक गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं। सुपारी से लेकर गुण्डाटैक्स की वसूली तक सारे फैसले जेलों से ही हो रहे हैं। यह भी पता चला है कि माफिया सरगना अपने साथ काम करने वाले बदमाशों को बकायदा हर माह जेल से ही वेतन देते हैं। जेलों में वेतन के लिए बोरों में नोट पहुंचने की सूचनाएं भी समय-समय पर मिलती रही हैं। वेतन ही नहीं ये माफिया बकायदा अपने मुलाजिमान को बीमारी के इलाज, किसी के क्रिया-कर्म अथवा शादी आदि के लिए अनुदान भी जेलों से बांटते हैं। कमजोर, भ्रष्ट और लचर जेल प्रशासन कभी इनके इन मामलात में छेड़छाड़ की जुर्रत नहीं जुटा पाता है। कुल मिलाकर जेल अपराधियों के लिए अपने आप में कम्फर्ट जोन बने हुए हैं। 19 जुलाई 2013 को आजमगढ़ में बसपा के बाहुबली विधायक सर्वेश सिंह उर्फ सिप्पू की सनसनीखेज हत्या इसका एक जीता-जागता ताजा प्रमाण था। कारण कि प्रदेश के तत्कालीन एडीजी लॉ ऐंड आर्डर अरूण कुमार जो उस समय वाराणसी में थे, ने यहां स्वीकार किया था कि सिप्पू की हत्या का जाल-बट्टा वाराणसी सेंट़ल जेल में बंद शातिर अपराधी कुण्टू सिंह द्वारा ही बुना गया था। कुण्टू के खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है जबकि इस मामले की जांच सीबीआई भी कर रही है।

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तो पुलिस भी भूल गई डिप्टी जेलर का कत्ल 

पूर्वी उत्तर प्रदेश में हुए चर्चित हत्याकाण्डों के बाद पुलिस ने अपराधियों के खिलाफ कुछ रणनीति बनाने की सोची लेकिन इससे पूर्व कि वह कुछ कर पाती गत 23 नवम्बर को वाराणसी में जिला कारागार के डिप्टी जेलर अनिल त्यागी का कत्ल कर दिया गया। पुलिस कातिलों का पता आजतक नहीं लगा सकी है और अबतो ऐसा लगता है जैसे बनारस पुलिस इस हत्याकाण्ड को भूल ही चुकी है। इंस्पेक्टर कैंट को हटाकर उनकी जगह नये इंस्पेक्टर को इसलिए लाया गया कि वह इस केस को वर्कआउट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे लेकिन वह भी धोख के टट्टू या काठ की तलवार से ज्यादा कुछ नहीं साबित हो पाये। यह स्थिति तब है जब इस मामले में बृजेश गिरोह का नाम सामने आया जिसके गुर्गों पर अनिल ने जेल में लगाम कसी थी। नये बड़े पुलिस कप्तान भी माफिया गतिविधियां और अपराध रोक पाने में कहीं से कारगर नहीं हो सके हैं।

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बोलने लगी रंगरूट गिरोहों की तूती

जेल में बंद पुराने माफिया सरगनाओं की करतूतों का पर्दाफाश न होते देखे पूर्वांचल में कुछ रंगरूट अपराधियों ने अपनी बंदूकांे की नाल खोल दी है। गुण्डा टैक्स एवं फिरौती की खेती में ये बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे हैं। मनीष सिंह और अजीम गिरोह इनमें सबसे खूंखार होकर सामने आये हैं जिनकी धाक कुछ व्यापारियों की हत्या के बाद से जमने लगी है। इनके द्वारा ज्यादातर घटनाएं शहर से बाहर ग्रामीण क्षेत्रों के मशहूर व्यापारियों के साथ की गयीं हैं। वाराणसी और पड़ोसी जिलों के कई चिकित्सकों, व्यापारियों तथा उद्योगपतियों द्वारा की गयी गुण्डा टैक्स मांगे जाने की शिकायतों के बाद पुलिस ने अबतक जो जांच पड़ताल की है उसके इनपुट के मुताबिक इन नये बदमाशों को भी पुराने और स्थापित माफिया गिरोहों की ही सह प्राप्त है।

 

क्या सपा राज ही सबसे खराब?

यूपी के पूर्वांचल में पिछले लगभग एक साल से लगातार बढ़ती माफिया गिरोह की हरकतों ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है कि क्या मुलायम-अखिलेश सरकार ही सबसे खराब है?

छूसरा सवाल यह कि क्या सरकार ही अपराधियों को आ बैल मुझे मार का न्योता दे रही है? जवाब है-शायद नहीं। क्योंकि कोई भी सरकार अपने नाम के साथ जंगलराज या गुंडाराज जैसे तखल्लुस की शौकीन नहीं होगी। यदि इसे माना जाय तो एक और सवाल उठता है कि क्या सरकार इन माफियाओं के आगे बौनी और कमजोर है? यदि इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक मिले तो एक अन्य प्रश्न उठता है कि क्या पुलिस और नौकरशाह इस सरकार की ऐसी-तैसी कराने की सोच बैठे हैं। सपाई कहते हैं यही उत्तर सबसे सही है क्योंकि अपफसरों की जो फौज प्रदेश में मौजूद है काम तो सरकार को उसी से लेना होगा। चाहे वह जैसे हो क्योंकि इनका विकल्प फिलहाल सरकार के पास नहीं है। 

 

 

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