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राज रंजना

पुलिस प्लेटफार्म

लखनऊ पुलिस का नया कारनामा, मृतक को बना दिया कच्चा शराब बनाने का आरोपी

लखनऊ. मलीहाबाद शराब त्रासदी के बाद हरक में आई पुलिस का नया कारनामा सामने आया है। पारा में कच्ची शराब बनाने के आरोप में पुलिस ने तीन साल पहले मृतक को आरोपी बनाकर सरगर्मी से तलाश कर रही है। पुलिस का आरोप है कि मृतक जहरीली शराब बनाने के काम में लगा हुआ है।  मिली जानकारी के अनुसार, पारा थानांतर्गत आने वाले सरौसा सदर निवासी राजू पुत्र जगनू की तीन साल पहले मौत हो गई है। पारा पुलिस राजू के नाम पर भी मुकदमा दर्ज कर लिया और उसकी सरगर्मी से तलाश कर रही है। परिजनों की माने तो उसकी खोज बीन में कई बार पारा पुलिस दरवाजे तक आ चुकी है और उसे हाजिर करने का दबाव बना रही है। रिकॉर्ड में था शराब कारोबारी   पुलिस के रिकॉर्ड में वह कच्ची शराब का कारोबारी था।

विविध रंग

इनवेस्टर्स मीट: नोएडा में लगेगा सैमसंग प्लांट, पांच हजार करोड़ के एमओयू साइन

लखनऊ. मोबाइल उद्योग को बढ़ावा देने के लिए यूपी सरकार ने एक नई पहल की है। इसके तहत मंगलवार को ई-उत्तर प्रदेश इनवेस्टर्स मीट का आयोजन किया गया। इसमें देशभर से आए उद्यमियों का जमावड़ा लगा। सीएम अखिलेश यादव ने इनवेस्टर्स मीट की अध्यक्षता की। इस दौरान उन्होंने इंडियन सेल्युलर एसोसिएशन, लावा स्पाइस और इओएन के साथ कई अहम योजनाओं को लेकर करीब पांच हजार करोड़ रुपए के मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) पर साइन किए। इससे कुल 50 हजार युवाओं को रोजगार मिलेगा। मीट में इसके अलावा नोएडा में सैमसंग मोबाइल प्लांट और गाजियाबाद में आईटी पार्क बनाने पर भी फैसला लिया गया। इन्वेस्टर्स मीट में इलेक्ट्रॉनिक इंडस्ट्री एसोसिएशन ऑफ इंडिया के जनरल सेक्रेटरी राजू गोयल, इंडिया इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमी कंडक्टर के चेयरमैन अशोक चंडक, इंडियन सेल्युलर एसोसिएशन के नेशनल प्रेसिडेंट पंकज मोहिंदू, स्पाइस ग्रुप के दिलीप मोदी, एम्बेसी ऑफ रिपब्लिक कोरिया

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नई दिल्ली। कश्मीर के भारत में विलय पर सरदार पटेल के विचारों के बारे में भारत प्रशासित कश्मीर के कांग्रेसी नेता सैफुद्दीन सोज की टिप्पणी से नया विवाद पैदा हो गया है। सोज का कहना है कि अगर पाकिस्तान भारत को हैदराबाद देने के लिए तैयार होता, तब सरदार पटेल को भी पाकिस्तान को कश्मीर देने में कोई दिक्कत नहीं होती।

सोज ने यह दावा अपनी किताब ’कश्मीर: ग्लिम्प्स ऑफ हिस्ट्री एंड द स्टोरी ऑफ स्ट्रगल्स’ में किया है। इस किताब में बंटवारे की बहुत सी घटनाओं का उल्लेख किया गया है लेकिन क्या सरदार पटेल का वास्तव में कश्मीर पाकिस्तान को देने का विचार था? क्या सोज के दावे में कोई सच्चाई है?-ये सवालात बेसाख्ता खड़े हो गये हैं।

सोज अपनी किताब में लिखते हैं, ’पाकिस्तान के कश्मीर ऑपरेशन के इंचार्ज सरदार हयात खान के सामने लॉर्ड माउंटबेटन ने सरदार का प्रस्ताव पेश किया था। प्रस्ताव के अनुसार, सरदार पटेल की शर्त थी कि अगर पाकिस्तान हैदराबाद दक्कन को छोड़ने के लिए तैयार है तो भारत भी कश्मीर पाकिस्तान को देने के लिए तैयार है। हयात ने इस संदेश को पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान तक पहुँचाया था। तब प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने कहा,’मैं पागल नहीं हूं कि कश्मीर और उसके पत्थरों के लिए एक ऐसे क्षेत्र (हैदराबाद) को जाने दूं जो पंजाब से भी ज्यादा बड़ा है।’ 

सोज ने अपनी किताब में कश्मीर और इसके इतिहास के विशेषज्ञ एजी नूरानी के एक लेख का भी जिक्र किया है। बीच में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने भी कहा था कि सरदार पटेल जूनागढ़ और हैदराबाद के बदले में कश्मीर देने को तैयार थे।

भारत के पूर्व गृह सचिव और सरदार के करीबी सहयोगी रहे वीपी मेनन ने भी कहा था कि शुरुआत में सरदार कश्मीर को पाकिस्तान देने को राजी थे। मेनन अपनी किताब ’इंटिग्रेशन ऑफ द इंडियन स्टेट’ में लिखते हैं, ’तीन जून 1947 को रियासतों को यह विकल्प दिया गया था कि वह चाहें तो पाकिस्तान के साथ विलय कर सकती हैं या भारत के साथ रह सकती हैं।

कश्मीर एक ऐसा मुस्लिम बहुल प्रांत था जिस पर हिंदू राजा हरि सिंह का शासन था। साफतौर पर हरि सिंह के लिए किसी को चुनना आसान नहीं था। इस मामले को सुलझाने के लिए लॉर्ड माउंटबेटन ने महाराजा हरि सिंह के साथ चार दिन बिताए थे। माउंटबेटन ने महाराजा से कहा था कि सरदार पाकिस्तान के साथ जाने के कश्मीर के फैसले का विरोध नहीं करेंग।

उधर इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने सोज की किताब के दावों पर सहमति जताई है।

 

ट्विटर पर गुहा ने लिखा,’कश्मीर पाकिस्तान को देने को लेकर पटेल को कोई दिक्कत नहीं थी। गुहा इसमें जोड़ते हुए कहते हैं कि सरदार की आत्मकथा में राजमोहन गांधी ने भी इसका जिक्र किया है।

राजमोहन गांधी अपनी किताब ’पटेल ए लाइफ’ में लिखते हैं, ’13 सितंबर 1947 तक पटेल के कश्मीर को लेकर अलग विचार थे। सरदार ने भारत के पहले रक्षा मंत्री बलदेव सिंह को लिखे पत्र में भी कुछ ऐसा ही लिखा है. वह अपने पत्र में लिखते हैं कि कश्मीर अगर किसी दूसरे राष्ट्र का शासन अपनाता है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।

राजमोहन गांधी अपनी किताब में लिखते हैं, ’जब पाकिस्तान ने जूनागढ़ के नवाब के विलय के निवेदन को स्वीकार कर लिया केवल तभी कश्मीर को लेकर सरदार के विचार में बदलाव आया। 26 अक्तूबर 1947 को नेहरू के घर पर एक बैठक हुई थी। कश्मीर के दीवान मेहर चंद महाजन ने भारतीय सेना की मदद के लिए कहा था। महाजन ने यह भी कहा कि अगर भारत इस मांग पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है तब कश्मीर जिन्ना से मदद के लिए कहेगा। नेहरू यह सुनकर गुस्से में आ गए और उन्होंने महाजन को चले जाने को कहा।

उस वक्त सरदार ने महाजन को रोका और कहा, ’महाजन, आप पाकिस्तान नहीं जा रहे हैं।

गुजराती भाषा में सरदार पटेल पर ’सरदार साचो मानस साची वात’ लिखने वालीं उर्विश कोठारी ने कहा है कि रजवाड़ों के विलय के दौरान सरदार कश्मीर का भारत का अंग बनने को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं थे। उर्विश कहते हैं, ’इसकी मुख्यतः दो वजहें थीं- पहली उस राज्य का भूगोल और दूसरा राज्य की आबादी। उर्विश कोठारी ने विस्तार से कहा, ’इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि कश्मीर एक सीमाई राज्य था और उसकी अधिकतर जनसंख्या मुसलमान थी। इसी कारण सरदार कश्मीर का भारत में विलय करने को लेकर ज्यादा हठी नहीं थे लेकिन नेहरू जो खुद कश्मीरी थे वह कश्मीर को भारत में चाहते थे।

उर्विश कोठारी के मुताबिक कश्मीर के दोनों प्रतिष्ठित नेता महाराजा हरि सिंह और शेख अब्दुल्ला नेहरू के दोस्त थे। कश्मीर को लेकर नेहरू के नरम रुख का एक यह भी कारण था। उसी समय जूनागढ़ विवाद शुरू हुआ और सरदार कश्मीर मसले में दाखिल हुए। इसके बाद सरदार ने बिलकुल साफतौर पर कहा कि कश्मीर भारत के साथ रहेगा।

बीबीसी के मुताबिक वरिष्ठ पत्रकार हरि देसाई कहते हैं,’शुरुआती दिनों में कश्मीर के पाकिस्तान में जाने से सरदार को कोई समस्या नहीं थी. बहुत से दस्तावेजों में यह है भी. जून 1947 में सरदार ने कश्मीर के महाराजा को भरोसा दिलाया था कि कश्मीर के पाकिस्तान में विलय पर भारत आपत्ति नहीं करेगा, लेकिन महाराजा को 15 अगस्त से पहले फैसला लेना होगा।उर्विश कोठारी कहते हैं, ’हमारे पास दस्तावेज हैं जो उन ऐतिहासिक घटनाओं और फैसलों को दर्शाते हैं लेकिन वे फैसले उस विशेष स्थिति में लिए गए थे। राजनेता अपने एजेंडे के लिए उन ऐतिहासिक घटनाओं का केवल आधा सच ही दिखाते है। हम निश्चित तौर पर नेहरू या सरदार लिए गए फैसलों का विश्लेषण कर सकते हैं लेकिन हमें उनके इरादों पर शक नहीं करना चाहिए।

 

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